यह पाठ भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी श्री रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की आत्मकथा का एक अंश है। इसमें उन्होंने अपने जीवन पर अपनी माँ के गहरे प्रभाव और उनके प्रति अपनी असीम श्रद्धा को व्यक्त किया है। यह पाठ एक माँ के त्याग, प्रेम और प्रेरणा की कहानी है, जिसने अपने बेटे को एक महान क्रांतिकारी बना दिया।
लेखक का संक्षिप्त परिचय
रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ (1897-1927) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे। वे एक वीर स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक बेहतरीन कवि और लेखक भी थे। “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” जैसा प्रसिद्ध गीत लिखने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है। देश की आज़ादी के लिए लड़ते हुए मात्र 30 वर्ष की आयु में अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें फाँसी दे दी थी। यह पाठ, ‘मेरी माँ’, उनकी आत्मकथा ‘निज जीवन की एक छटा’ का एक भावुक अंश है।

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ एक महान स्वतंत्रता सेनानी और लेखक थे।
पाठ का सरल सारांश
इस पाठ में, रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ अपनी माँ को अपने जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा मानते हैं। वे कहते हैं कि उनके अंदर जो भी हिम्मत और जीवन के प्रति जो भी अच्छा दृष्टिकोण है, वह उनकी माँ और उनके गुरु श्री सोमदेव की ही देन है।
बिस्मिल बताते हैं कि उनके पिता और दादी जी उनके सामाजिक कार्यों के सख्त खिलाफ थे। लेकिन उनकी माँ हमेशा उनका हौसला बढ़ाती थीं। जब बिस्मिल के घरवाले उनकी शादी कराना चाहते थे, तो उनकी माँ ने ही जोर देकर कहा कि शादी पढ़ाई पूरी होने के बाद ही करनी चाहिए।
बिस्मिल अपनी माँ के संघर्ष और सीखने की इच्छा के बारे में भी बताते हैं। उनकी माँ ग्यारह साल की उम्र में शादी करके शाहजहाँपुर आईं थीं और तब वे बिल्कुल पढ़ी-लिखी नहीं थीं। लेकिन उन्होंने घर का काम-काज सीखने के बाद, अपने खाली समय में मुहल्ले की सखी-सहेलियों से पढ़ना-लिखना सीखा। अपनी मेहनत से वे जल्द ही देवनागरी में लिखी किताबें पढ़ने लगीं।
बिस्मिल अपने क्रांतिकारी जीवन में अपनी माँ के सहयोग की तुलना इटली के महान क्रांतिकारी मेजिनी की माँ से करते हैं। उनकी माँ का सबसे बड़ा आदेश था कि कभी किसी की जान नहीं लेनी चाहिए, चाहे वह दुश्मन ही क्यों न हो।
अंत में, फाँसी से पहले वे अपनी माँ को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। वे कहते हैं कि वे कई जन्मों में भी अपनी माँ का कर्ज नहीं चुका सकते। वे अपनी माँ से धैर्य रखने का आग्रह करते हैं और कहते हैं कि उन्हें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उनके बेटे ने भारत माता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
बिस्मिल की माँ के मुख्य गुण
- साहसी और सहयोगी: वे पति के विरुद्ध जाकर भी अपने बेटे के देश-सेवा के कार्यों में उसका साथ देती थीं।
- शिक्षा-प्रेमी: वे खुद अशिक्षित थीं, पर उन्होंने मेहनत से पढ़ना-लिखना सीखा।
- दूरदर्शी: उन्होंने बिस्मिल के विवाह से पहले उनकी शिक्षा पूरी होने पर जोर दिया।
- अत्यंत दयालु: उनका सबसे बड़ा उपदेश था कि किसी भी प्राणी की जान नहीं लेनी चाहिए।
- प्रेरणा की स्रोत: वे बिस्मिल को हमेशा प्रेम से समझाती थीं और हर संकट में उनका हौसला बढ़ाती थीं।
अभ्यास के लिए नए प्रश्न और उत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
- बिस्मिल के क्रांतिकारी जीवन में उनकी माँ की तुलना किससे की गई है?
(क) रानी लक्ष्मीबाई से
(ख) भगत सिंह की माँ से
(ग) मेजिनी की माँ से
(घ) गुरु गोबिंद सिंह की पत्नी से
उत्तर: (ग) मेजिनी की माँ से - बिस्मिल की माँ ने अपनी पढ़ाई कैसे शुरू की?
(क) स्कूल जाकर
(ख) अपने पति से सीखकर
(ग) मुहल्ले की सखी-सहेलियों से
(घ) अपने बेटे से
उत्तर: (ग) मुहल्ले की सखी-सहेलियों से - बिस्मिल के अनुसार, वे किस ऋण को कभी नहीं उतार सकते?
(क) देश का ऋण
(ख) गुरु का ऋण
(ग) पिता का ऋण
(घ) माँ का ऋण
उत्तर: (घ) माँ का ऋण - बिस्मिल को अपनी कौन सी इच्छा पूरी न होने का दुःख था?
(क) देश को आज़ाद देखने की
(ख) अपनी माँ की सेवा करने की
(ग) विवाह करने की
(घ) एक बड़ा सेनाध्यक्ष बनने की
उत्तर: (ख) अपनी माँ की सेवा करने की - अपनी माँ को धैर्य बँधाने के लिए बिस्मिल ने किसका उदाहरण दिया?
(क) भगत सिंह की माँ का
(ख) मेजिनी की माँ का
(ग) गुरु गोबिंद सिंह जी की पत्नी का
(घ) अपनी दादी का
उत्तर: (ग) गुरु गोबिंद सिंह जी की पत्नी का
लघु उत्तरीय प्रश्न
- प्रश्न 1: पिताजी और दादीजी के विरोध के बावजूद बिस्मिल की मदद कौन करता था और कैसे?
उत्तर: पिताजी और दादीजी के विरोध के बावजूद बिस्मिल की माँ उनकी मदद करती थीं। जब बिस्मिल को लखनऊ कांग्रेस में जाना था, तो उनकी माँ ने ही उन्हें चुपके से खर्चा दिया था। - प्रश्न 2: वकील के कहने पर भी बिस्मिल ने जाली हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?
उत्तर: बिस्मिल ने जाली हस्ताक्षर करने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि वे इसे धर्म के विरुद्ध और एक पाप मानते थे। वे अपने जीवन में हमेशा सत्य का पालन करते थे। - प्रश्न 3: बिस्मिल की माँ का सबसे बड़ा आदेश क्या था?
उत्तर: बिस्मिल की माँ का सबसे बड़ा आदेश यह था कि वे कभी किसी की जान न लें, चाहे वह उनका दुश्मन ही क्यों न हो। - प्रश्न 4: बिस्मिल को विश्वास था कि इतिहास में उनकी माँ का नाम भी लिखा जाएगा। क्यों?
उत्तर: बिस्मिल को यह विश्वास इसलिए था क्योंकि उनकी माँ ने भारत माता की सेवा के लिए अपने बेटे का बलिदान दिया था। वे मानते थे कि जब भी आज़ाद भारत का इतिहास लिखा जाएगा, तो उनकी माँ के इस त्याग का उल्लेख उज्ज्वल अक्षरों में किया जाएगा। - प्रश्न 5: बिस्मिल अपनी माँ से अंतिम वरदान क्या माँगते हैं?
उत्तर: बिस्मिल अपनी माँ से यह अंतिम वरदान माँगते हैं कि मृत्यु के समय उनका हृदय बिलकुल भी विचलित न हो और वे अपनी माँ के चरणों को प्रणाम करते हुए और ईश्वर का ध्यान करते हुए अपने प्राण त्याग दें।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
- प्रश्न 1: बिस्मिल की माँ स्वयं अशिक्षित थीं, फिर भी उन्होंने अपनी और अपनी बेटियों की शिक्षा का प्रबंध कैसे किया? यह उनके किन गुणों को दर्शाता है?
उत्तर: बिस्मिल की माँ विवाह के समय बिलकुल अशिक्षित थीं, लेकिन उनमें सीखने की प्रबल इच्छा थी। उन्होंने घर का सारा काम खत्म करने के बाद मिले खाली समय का सदुपयोग किया। वे अपने मुहल्ले में आने वाली पढ़ी-लिखी सहेलियों से अक्षर ज्ञान प्राप्त करती थीं। अपनी इसी लगन और परिश्रम के बल पर वे कुछ ही समय में देवनागरी की पुस्तकें पढ़ने लगीं। इसके बाद वे अपनी बेटियों को भी खुद ही पढ़ाती थीं। यह घटना उनके दृढ़-निश्चयी, परिश्रमी और शिक्षा-प्रेमी होने के गुणों को दर्शाती है। - प्रश्न 2: “यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता।” बिस्मिल के इस कथन का क्या आशय है? विस्तार से समझाइए।
उत्तर: बिस्मिल के इस कथन का गहरा आशय है। वे कहना चाहते हैं कि एक साधारण व्यक्ति की तरह जीना, यानी सिर्फ अपनी नौकरी और परिवार के बारे में सोचना, बहुत आसान है। लेकिन देश के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर देना एक असाधारण कार्य है। बिस्मिल मानते हैं कि यह असाधारण बनने की प्रेरणा और नैतिक बल उन्हें अपनी माँ से ही मिला। यदि उनकी माँ भी साधारण होतीं और उन्हें इन कार्यों से रोकतीं, तो शायद वे कभी क्रांतिकारी नहीं बन पाते। - प्रश्न 3: बिस्मिल के जीवन को गढ़ने में उनकी माँ की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: बिस्मिल के जीवन को एक महान क्रांतिकारी के रूप में गढ़ने में उनकी माँ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी।- नैतिक विकास: माँ ने उन्हें हमेशा सच बोलने और धर्म के रास्ते पर चलने की शिक्षा दी।
- साहस और प्रेरणा: जब घर के अन्य सदस्य बिस्मिल के देश-सेवा के कार्यों का विरोध करते थे, तब माँ उनका उत्साह बढ़ाती थीं।
- शिक्षा का महत्व: माँ ने खुद पढ़-लिखकर और बिस्मिल को भी शिक्षा के लिए प्रोत्साहित कर उनके बौद्धिक विकास की नींव रखी।
- मानवीय मूल्य: माँ ने उन्हें सबसे बड़ा पाठ यह पढ़ाया कि किसी की जान नहीं लेनी चाहिए, जिससे उनके मन में मानवता के प्रति सम्मान पैदा हुआ।
संक्षेप में, बिस्मिल के चरित्र की हर खूबी पर उनकी माँ की छाप थी।
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